Monday, November 2, 2009

कितने बड़े संगीत प्रेमी हैं हम हिंदुस्तानी

प्रसून जोशी
पिछले दिनों मैं एक म्यूजिक रिकॉर्डिंग सेशन से लौटा, खीझ से भरा हुआ। इस तरह की खीझ के जिम्मेदार हम और आप हैं। आखिर क्यों हर
प्रड्यूसर बार-बार यही कहता है कि आजकल तो साहब यही ट्यून चल रही है, बस इसी के हिसाब से बोल गढ़ दीजिए। ज्यादा शब्दों और भावों के फेर में मत पड़िए। होता यह है कि प्रड्यूसर के सामने म्यजिक डाइरेक्टर कोई धुन सुनाता है। हम उस धुन की तर्ज पर कुछ शब्द गुनगुनाने लगते हैं। फौरी तौर पर उन लाइनों को लिख दिया जाता है और इन्हें डमी लिरिक्स कहा जाता है। जब धुन और बोल फाइनल करने की बात आती है, तो बाजार का प्रेशर दिखने लगता है। आजकल तो यही ढिंचिक-ढिंचिक चल रहा है, उसी में कुछ आगा-पीछा कर लिया जाए। मुझसे अक्सर कहा जाता है कि अब आप नए शब्दों के चक्कर में मत पड़िए, वही डमी के बोल रहने दीजिए। और यह सब किसके नाम पर किया जाता है, आपके, जनता के नाम। ऐसा क्यों होता है कि नया म्यूजिक, नए ताजा बोल आपको उतने नहीं लुभाते या फिर हो सकता है कि बाजार ही आपकी चॉइस की गलत व्याख्या कर रहा है।

जब इन तमाम चीजों पर सोचने बैठता हूं तो एक बात ध्यान में आती है, जो अक्सर कही जाती है। यह बात है भारत को संगीत प्रेमी बताने की। मगर हम लोग संगीत के नाम पर कुछ फॉर्म्युलों के गुलाम बनकर रह गए हैं। जिस चीज को हम संगीत के प्रति अपनी दीवानगी या पसंद कहते हैं, वह भी कुछ यादों-कुछ बातों की बिना पर महसूस करना ही है और कुछ नहीं। नए संगीत को हम लोग कितना खुले दिल से स्वीकारते हैं।

संगीत एक ऐसा कला रूप है, जिसमें किसी कमिटमेंट की डिमांड नहीं की जाती। मसलन, कविता में किसी विचार की स्पष्टता होती है। तो आप उसे सुनकर बता सकते हैं कि भाई हमें इसका यह विचार, यह भाव पसंद आया। आपका रुझान साफ होता है। मगर म्यूजिक को लेकर यह बात नहीं है। आप उसे सुनते हैं, पसंद करते हैं, मगर साफ-साफ नहीं बता सकते कि ऐसा क्यों करते हैं।

संगीत के नाम पर फिल्मी संगीत है और दूसरी तरह का संगीत हम सुनना ही नहीं चाहते। जो लोग कहते हैं कि वे संगीत सुन रहे हैं, दरअसल वे उस संगीत के बोलों और छवियों से जुड़ी यादों को गुनते हैं। शायद सुनने वाले को कोई चेहरा, कोई पल याद आ रहा है। आपको लग रहा है कि आप संगीत पसंद कर रहे हैं, लेकिन सचाई यह है कि आप संगीत की सप्लाई कर रहे चित्र पसंद कर रहे हैं। बार-बार एक गाने को सुनना इस बात की निशानी है कि आप उस गीत संगीत से जुड़ी किसी चीज को पसंद कर रहे हैं और मैं कहना चाहता हूं कि आजकल लोग अजीब चीजें पसंद कर रहे हैं।

यह सिर्फ एक मुगालता है कि हम संगीत प्रेमी हैं। हमारे यहां संगीत के क्षेत्र में प्रयोगों का नितांत अभाव है। दूसरे देशों में रॉक, जैज और ब्लूज जैसा म्यूजिक पनपा है। मसलन, ब्लूज ब्लैक कम्युनिटी का म्यूजिक था। उसमें गुलामी का दर्द था, जो रात को थके मजदूर की आह में व्यक्त होता था। वेस्टर्न वर्ल्ड में इसे काफी सफल माना गया। हमारी बात की जाए तो हमने क्या इस तरह की कोई अभिरुचि रखी है कि तमाम किस्मों का संगीत पनपे? ऐसा नहीं है और इसी वजह से हमारे संगीत में नए के नाम पर बहुत कुछ नहीं है।

हमारे यहां यह सोचनीय स्थिति है कि फिल्मों के अलावा कोई संगीत बिकता नहीं है। चाहे गजल हो या ठुमरी, इनसे जुड़ा फनकार फिल्म की तरफ आना चाहता है। गजलें वही बड़ी हुईं जो फिल्मों में आ गईं। हमारे अंदर एक ही तरह का टेस्ट है और बाकी कुछ नहीं। लोग एक कलाकार की नकल कर संगीत साधना की बात करते हैं। मुकेश और किशोर की कॉपी कर संगीत प्रेमी खुश हो गए। क्यों, क्योंकि हम संगीत को नहीं, उससे जुड़ी चीजों को पसंद करते हैं, जिन्हें शायद हम जानते नहीं। पहले से फैसला कर लेते हैं कि आज मैं दर्द भरा गाना सुनना चाहता हूं। अपने जेहन में खांचे बना रखे हैं जिनके हिसाब से एप्रीशिएट करते हैं। मस्त गाना है तो नाचो।

बड़ी अजीब स्थिति है। संगीत के साथ किए गए प्रयोग सफल होते नहीं दिखते। कुछ लोग हैं जो ढूंढकर संगीत निकाल रहे हैं। उन्हीं की वजह से कुछ कलाकार बचे हुए हैं। इस स्थिति की वजह है हमारे अंदर नए विचारों की कमी। विचारों की आजादी बहुत कम है। हमारे यहां जब भी कोई बात होती हैं, तुरंत किसी को कोट कर दिया जाता है। हर बात पर कहना कि फलां जगह यह लिखा है। सब कुछ लिखा हुआ है, क्या इसीलिए आप कुछ सोचते ही नहीं है? हमारे यहां ऐसे विचारक न के बराबर हैं जो धामिर्क डोमेन से बाहर सोचते हैं। नए विचारों के प्रति आग्रह न होना ही नए संगीत के न पनपने की अहम वजह है।
(बातचीत : सौरभ द्विवेदी)

Sunday, October 25, 2009

मधुबाला: दर्द का सफर - the first biography of Madhubala in Hindi


मधुबाला: दर्द का सफर
हिन्दी में मधुबाला की पहली जीवनी)
भारतीय सिने पटल की अप्रतिम सौंदर्य की मल्लिका मधुबाला को गुजरे कई दशक बीत चुके हैं इसके बावजूद अपने सौंदर्य और अपने अभिनय की बदौलत वह आज तक भारतीय सिनेमा की आइकन बनी हुर्ह हंै। मधुबाला के समय की तुलना में आज का समाज बहुत बदल गया है लेकिन आज भी मधुबाला की तरह बनना और दिखना ज्यादातर लड़कियों का सपना रहता है। अत्यंत निर्धन परिवार में जन्मी और पली-बढ़ी मधुबाला ने लोकप्रियता का जो शिखर हासिल किया वह विलक्षण प्रतीत होता है। लेकिन इतना होेने के बावजूद भी मधुबाला के जीवन के ज्यादातर पहलुओं से लोग अनजान हैं।
मधुबाला की जिंदगी एवं फिल्मों पर आधारित पुस्तक में मधुबाला से जुड़े अनेक अनछुए पहलुओं को टटोलने की कोशिश की गई है। मधुबाला की कहानी गर्दिश से उठकर सितारों तक पहुंचने की कहानी मात्रा नहीं है बल्कि कठोर जीवन संघर्ष की एक मुकम्मल गाथा है जिसे पढ़ने पर पता चलता है कि जो कामयाबी और शोहरत दूर से अत्यंत सुहानी लगती है उसे पाने के लिए कितना कुछ खोना और सहना पड़ता है। मधुबाला की कहानी को पूरे ब्यौरे के साथ जानना इसलिए जरूरी है ताकि यह समझा जा सके कि कामयाबी का सफर जितना सुखद दिखता है दरअसल वह उतना सुखद नहीं होता बल्कि अक्सर उसे कांटे भरे रास्तों पर चल कर पूरा करना होता है।
मधुबाला का जीवन बहुत छोटा रहा। महज 36 साल की जिस उम्र में उन्होंने मौत को गले लगाया उस उम्र में लोग अपने करियर की कायदे से शुरूआत करते हैं लेकिन उन्होंने इस उम्र में ही सबकुछ पा लिया - बेपनाह शोहरत और समृद्धि। लेकिन इसके बाद भी उन्हें वे चीजें नहीं मिलीं जिनके लिए वह जीवन भर तड़पती रहीं। मधुबाला की कहानी जीवन के इस कड़वे सच को समझने के लिए भी जरूरी है। मधुबाला की कहानी एक और तरह से भी महत्वपूर्ण है। बाल कलाकार के रूप में जब मधुबाला का पदार्पण हुआ और 1942 में फिल्म बसंत में जब वह एक छोटी सी भूमिका में अवतरित हुईं तब भारतीय सिनेमा विकास के आरंभिक चरण में था और जब 1971 में उनकी अंतिम फिल्म ज्वाला रिलीज हुई तब भारतीय सिनेमा का स्वर्ण काल उतार पर था। मधुबाला भारतीय सिनेमा के सबसे सुनहरे दौर की गवाह रहीं और इस तरह मधुबाला के जीवन से गुजरने का मतलब भारतीय सिनेमा के सबसे सुनहरे दौर से गुजरना है। दुलर्भ तस्बीरों एवं जानकारियों से सुसज्जित यह पुस्तक न केवल मधुबाला के जीवन के सच को बल्कि उनके समय के सिनेमा और समाज को समझने के लिये उपयोगी है। 200 से अधिक पष्श्ठों वाली यह पुस्तक पेपरबैक संस्करण में जल्द ही प्रकाषित होने वाली है।
To know about this book you may contact on
Tel-09868914801/09868793203/0120-2880324

Thursday, September 24, 2009

मधुबाला - दिलीप कुमार

मधुबाला: दर्द का सफर

पुस्तक अंश

मधुबाला और निम्मी बचपन से ही दोस्त हो गयी थी लेकिन फिल्म अमर के सेट पर निम्मी और मधुबाला में गहरी दोस्ती हो गयी थी। महबूब खान के निर्देशन में बनी अमर (1954) अपने समय की आगे की फिल्म थी और संभवत इस कारण यह फिल्म काफी दर्शकों को पंसद नहीं आयी लेकिन इस फिल्म में दोनों अभिनेत्रियों के काम की सराहना हुयी। इस फिल्म में मधुबाला ने मीना कुमारी की जगह पर काम किया। मीना कुमारी ने इस फिल्म की 15 दिनों तक शूटिंग करने के बाद महबूब खान से मनमुटाव के कारण इस फिल्म को छोड़ दिया और मधुबाला तथा निम्मी को एक साथ काम करने का मौका मिला।



फिल्म अमर के सेट पर निम्मी और मधुबाला में गहरी दोस्ती हो गयी थी। वे अपने भोजन के साथ-साथ मेकअप रूम और अपने अनुभवों को भी शेयर करती थीं। दोनों इतनी गहरी दोस्त हो गयी कि दोनों के बीच दिलीप कुमार को लेकर भी चर्चाएं होने लगीं जो उस फिल्म में मुख्य अभिनेता की भूमिका निभा रहे थे। दिलीप कुमार को अपना दिल दे चुकी मधुबाला के दिमाग में निम्मी की बातों से थोड़ा संदेह उत्पन्न हुआ। मधुबाला के मन में यह स्वभाविक सवाल उठा, ‘‘निम्मी दिलीप का उतना ही ख्याल क्यों रखती है जितना मैं रखती हूं? यदि ऐसा है तो मुझे क्या करना चाहिए?’’ निम्मी ने बाद में एक साक्षात्कार में बताया, ‘‘एक दिन मधुबाला ने मुझे बुलाकर कहा, ‘‘निम्मी, क्या मैं तुमसे कुछ पूछ सकती हूं? मुझे विश्वास है कि तुम मुझसे झूठ नहीं बोलोगी और मुझसे कुछ नहीं छुपाओगी।’’ जब मैंने उन्हें आश्वस्त किया तो उन्होंने कहा कि अगर तुम दिलीप कुमार के बारे में वैसा ही महसूस करती हो जैसा मैं करती हूं तो मैं तुम्हारी खातिर उनकी जिंदगी से निकल जाउंगी और मैं उन्हें तुम्हारे लिये छोड़ दूंगी।’’जब निम्मी ने यह सुना तो उन्हें बेहद आश्चर्य हुआ और गहरा धक्का लगा। वह मधुबाला को यह कहकर छेड़ने लगी कि हालांकि वह उसकी (मधुबाला की) तरह खूबसूरत नहीं हैे लेकिन वह दान में पति नहीं चाहती है।’’



निम्मी ने बताया, ‘‘मैंने उसे सलाह दी कि वह वह अपने मूल्यवान विचार अपने पास ही रखे और आगे किसी को भी इस तरह का आॅफर न दे क्योंकि हो सकता है कि किसी को उनका विचार पसंद आ जाए और वह स्वीकार भी कर ले।........’’



निम्मी बताती है कि मधुबाला जितनी नेक थी, उतनी ही प्यारी भी थी। जब उनकी मृत्यु हुई तो मैं दिल से रोई।एक के बाद एक सभी चली गईं- गीता बाली, नरगिस, नूतन, मीना कुमारी। अब अब मधुबाला’’
साची प्रकाशन से शीघ्र प्रकाशित होने वाली पुस्तक ‘‘मधुबाला: दर्द का सफर’’ से सभार।

Sunday, September 20, 2009

पद न जाये -

- विनोद विप्लव
पुराने समय में जब प्राणों का उतना महत्व नहीं था और जब पद नाम की अमूल्य धरोहर का अविर्भाव नहीं हुआ था, तब लोग अपने वचन की रक्षा के लिये फटाफट प्राण त्याग दिया करते थे। रामायण, महाभारत और अन्य प्राचीन ग्रंथों में ऐसे उदाहरणों की भरमार है। उस समय लोग फालतू-बेफालतू बातों पर प्राण देने के लिये उतावले रहते थे। सदियों बाद जब लोगों को कुछ अक्ल आयी और जब प्राण को मूल्यवाण समझा जाने लगा तो लोग प्राण के बदले पद त्यागने लगे। इतिहास का यह ऐसा भयावह दौर था जिसे सोच कर सिर फोड़ने का मन करने लगता है। ऐसे मूर्ख अधिकारियों, मंत्रियों और नेताओं की भरमार थी जो उस तत्परता एवं निर्ममता के साथ पद त्यागते थे जिस निर्ममता के साथ लोग चिथड़े-चिथड़े हो गये कपड़े को भी नहीं त्यागते। पलायनवाद का ऐसा शर्मनाक दौर था। जब प्राण मिली है तो प्राण का और जब पद मिला है तो पद का सम्मान करो। लेकिन इन पलायनवादियों को कौन समझाता। सभी एक से बढ़कर एक पलायनवादी थे।

लेकिन अब हमारा देश अंधकार के युग से निकल चुका है। अब लोगों ने प्राण और पद के महत्व को भली भांति समझ लिया है। लोगों को पता चल गया है कि प्राण और पद कितने मूल्यवाण है। जिस तरह से मानव प्राण पाने के सांप-बिच्छुओं आदि के रूप में असंख्य जन्म लेने पड़ते हैं उसी तरह से हजारों पापड़ बेलने, लोहे के सैकड़ों चने चबाने तथा लाख तरह के जुगाड़ और पुण्य-अपुण्य कार्य करने के बाद पद मिलता हैं। इसलिये इतने मुश्किल से मिले पद को त्यागना सरासर मूर्खता नहीं तो और क्या है। जब प्राण मिला है तो जी भर के जियो और पद मिला तो मनभर कर उसका उपभोग करो। यही आदर्श जीवन दर्शन है और खुशी की बात है कि आज लोगों ने इस दर्शन को अपना लिया है। पहले तो लोग ऐसे-ऐसे कारणों से पद त्याग देते थे जिसे सोचकर इनके दिमाग पर तरस आता है। किसी ड्राइवर या गार्ड की गलती से कोई ट्रेन कहीं भिड़ गयी या पटरी से उतर गयी तो रेल मंत्री ने पद त्याग दिया। किसी क्लर्क ने सौ-दो सौ रूपये का घूस खा लिया तो वित्त मंत्री ने इस्तीफा दे दिया। किसी राज्य में पुलिस के किसी जवान ने किसी को डंडा छूआ दिया तो मुख्यमंत्री ने पद छोड़ दिया। लेकिन अब हमारे देश का लोकतंत्र परिपक्व हो चुका है। हमारे नेता कर्तव्यों और भावनाओं के मायाजाल में नहीं फंसते। हालांकि आज भी कुछ ऐसे लोकतंत्र विरोधी लोग हैं जो महिलाओं को सरेआम नंगा किये जाने, उनका सामूहिक बलात्कार किये जाने और निर्दोश छात्र-छात्राओं को आंतकवादी बताकर उन्हें पुलिसिया मुठभेड़ में मार गिराये जाने जैसी छोटी-मोटी घटनाओं को लेकर मंत्रियों और मुख्यमंत्रियों से इस्तीफे की मांग करते रहते हैं, लेकिन अब मंत्री-मुख्यमंत्री इतने कच्चे दिल के नहीं हैं कि वे ऐसी घटनाआंे पर इस्तीफा दे दें। ऐसी घटनायें तो रोज और हर कहीं होती हैं और अगर इन्हें लेकर इस्तीफा देने की पुरातन कुप्रथा फिर शुरू हो गयी तो फिर राज-काज कौन संभालेगा। फिर कैसे सरकार, संसद और विधानसभायें चलेंगी। ऐसे में तो लोकतंत्र का चारों खंभा ही ढह जायेगा और देश रसातल में चला जायेगा। यह तो गनीमत है कि हमारे नेताओं और मंत्रियों में सद्बुद्धि आ गयी है जिसके चलते देश और लोकतंत्र बचा हुआ है।

Monday, September 14, 2009

लाइलाज बीमारियों में कारगर है होलिस्टिक चिकित्सा

लाइलाज बीमारियों में कारगर है होलिस्टिक चिकित्सा
लाइलाज बीमारियों एवं दर्द से मुक्ति पाने के लिये मनुष्य सदियों से प्रयत्नरत है। प्राचीन समय में बीमारियों से छुटकारा पाने के लिये लोग वैद्य-हकीमों, जादूगरों, शोमैनों और पुजारियों की शरण लेते थे। आधुनिक समय में बीमारियों के इलाज के लिये हालांकि अनेक आधुनिक औषधियों, आधुनिक किस्म की सर्जरी और अनेक चिकित्सा विधियों का विकास हो चुका है लेकिन अक्सर देखा जाता है कि उपचार की ऐलोपैथी की औषधियों एवं आधुनिक चिकित्सा विधियों बीमारियां दूर होने के बजाय गंभीर होती जाती है और एक स्थिति ऐसी आती है जब दवाईयां और इंजेक्शन निष्प्रभावी हो जाते हैं। कई बार ये दवाईयां खुद मर्ज से कहीं अधिक परेशानी पैदा करती हैं। इन दवाईयों के दुष्प्रभाव के कारण नयी बीमारियां पैदा हो जाती हंै। आज तक ऐसी कोई दवाई नहीं बनी जो पूरी तरह से दुष्प्रभाव रहित हो। कई बार ऐलोपैथी रक्त स्राव अथवा दिमागी दौरे के कारण बन सकती हैं जिनसे रोगी की मौत तक हो सकती है। आज जब दर्दनिवारक दवाईयों के अंधाधुंध सेवन ने एक महामारी का रूप धारण कर लिया है वैसे में अनेक देशों में होलिस्टिक चिकित्सा को दर्द निवारण एवं प्रबंधन की कारगर एवं दुष्प्रभावरहित पद्धति के रूप में लोकप्रियता हासिल हो रही है।
नयी दिल्ली स्थित इंद्रप्रस्थ अपोलो अस्पताल के होलिस्टिक विशेषज्ञ डा. रविन्द्र के. तुली का कहना है कि आधुनिक चिकित्सा तथा होलिस्टिक चिकित्सा जैसी विभिन्न वैकल्पिक चिकित्सा प्रणालियों की मदद से लाइलाज बीमारियों से पीड़ित मरीजों को किसी दवाई की मदद के बगैर स्थायी तौर पर राहत दिलायी जा सकती है। होलिस्टिक चिकित्सा कमर दर्द, गर्दन दर्द, आथ्र्राइटिस, ओस्टियो - आथ्र्राइटिस, गठिया, सियाटिका, कैंसर पीड़ा, सिर दर्द, माइग्रेन, इरीटेबल बाउल सिंड्रोम, साइनुसाइटिस, डिस्क समस्या, पेट दर्द, हर्पिज, न्यूरेल्जिया और डायबेटिक न्यूरोपैथी जैसे किसी भी तरह के दर्द का सफलतापूर्वक निवारण हो सकता है। इसके अलावा हाल के वर्षों में होलिस्टिक चिकित्सा एवं एक्युपंक्चर को कैंसर रोगियों को कष्टों से निजात दिलाने की एक महत्वपूर्ण तरकीब के रूप में माना जाने लगा है। मौजूदा समय में होलिस्टिक चिकित्सा एक सम्पूर्ण चिकित्सा पद्धति के रूप में विकसित हुआ है।
भारत में होलिस्टिक चिकित्सा को बढ़ावा देने के उद्देश्य से स्थापित सोसायटी फाॅर होलिस्टिक एडवांसमेंट आॅफ मेडिसीन (सोहम) के संस्थापक डा. तुली बताते कि कोई भी दर्द लाइलाज नहीं होता है। दर्द शरीर के किसी भाग में उत्पन्न किसी न किसी व्याधि का संकेत होता है और इसलिये दर्द को स्थायी तौर पर जड़ से दूर करने के लिये उस व्याधि या दर्द के कारण को ठीक करना जरूरी है। होलिस्टिक चिकित्सा मरीज को दर्द से राहत दिलाने के साथ-साथ दर्द के कारण को दूर करती है।
डा. तुली का कहना है कि उन्होंने अपने 25 वर्ष के अनुभव से पाया है कि 90 प्रतिशत से अधिक मरीजों के लिये होलिस्टिक चिकित्सा कारगर है इसलिये किसी भी तरह के दर्द और रोग से ग्रस्त मरीज को जल्द से जल्द होलिस्टिक चिकित्सा की मदद लेनी चाहिये।
डा. तुली का कहना है कि होलिस्टिक चिकित्सा को प्रसव पीड़ा को नियंत्रित करने तथा सामान्य प्रसव सुनिश्चित कराने में काफी कारगर पाया गया है।
डा. तुली बताते हैं कि एक्युपंक्चर एवं होलिस्टिक चिकित्सा की अन्य विधियां दर्द से प्रभावित क्षेत्र की मांसपेशियों को रिलैक्स होने में मदद करती है तथा शरीर में प्राकृतिक दर्दनिवारक तत्व के उत्सर्जन को बढाती है। इसके अलावा यह प्रभावित भाग में रक्त प्रवाह को बढ़ाती तथा वहां की स्नायुओं की कार्यक्षमता में सुधार लाती है। इसके परिणाम स्वरूप होलिस्टिक चिकित्सा दर्द से तत्काल राहत दिलाने के साथ - साथ शरीर की हीलिंग रिस्पौन्स को स्पंदित करती है। कुछ समय तक एक्युपंक्चर एवं होलिस्टिक चिकित्सा नियमित रूप से लेते रहने पर दर्द धीरे - धीरे कम होता है और कुछ समय बाद दर्द इतना कम या नगण्य हो जाता है कि मरीज को सामान्य जीवन में कोई दिक्कत नहीं होती है। होलिस्टिक चिकित्सा के तहत मरीज को दर्द से राहत दिलाने के लिये एक्युपंक्चर के अलावा एक्युपे्रषर, योग एवं ध्यान, रेकी चिकित्सा आदि की भी मदद ली जाती है। एक्युपंक्चर के तहत बाल जैसी पतली सुइयों की मदद से षरीर के उन बिन्दुओं को स्पंदित किया जाता है जो शरीर में ची नामक ऊर्जा के प्रवाह को नियंत्रित करते हैं। यह प्रक्रिया कष्टदायक नहीं है।
डा. तुली के अनुसार होलिस्टिक चिकित्सा का मूल सिद्धांत यह है कि पूरे शरीर में एक खास शक्ति (प्राण) का सतत प्रवाह एवं निर्माण होता है। चीनी में इस शक्ति को ‘की’ कहा जाता है। इस शक्ति के तहत दो तरह की ऊर्जा निहित होती है। जब तक शरीर में जीवन शक्ति में समुचित संतुलन एवं समायोजन बना रहता है तब तक आदमी स्वस्थ रहता है। इसके संतुलन में गड़बड़ी होने की परिणति ही बीमारियों के रूप में होती है।